正当梅首相准备再次让议会决定是否接受英国政府与欧盟达成的脱欧协议草案之际,英国议会议长约翰·伯考引用古法,阻止梅政府一意孤行。
英国下议院议长伯考援引距今已有400多年的英国议会规则,向大家证明,在梅政府的提案上周第二次被议会压倒性多数否决后,议长决定阻止政府试图让议会就类似提案进行第三次投票是完全合理的。
议长突然发威,这个消息让英国梅政府、欧盟、忙于英国脱欧或反对英国脱欧的人们都大吃一惊。
但梅政府表示,尽管下议院议长的举措,梅政府仍在加紧推进特雷莎·梅的英国退出协议。
这是1604年(相当于中国明朝万历年间)英国议会制定的一项规则,声明如果一份动议措辞完全相同或实质上相同,政府不得在同一届议会会议上两次向下议院提出该动议。
如果用直白的语言可以形容说,如果政府提出的一份议案内容换汤不换药,不得一再向议会提出。
伯考此举显示了英国议会是真正掌握英国立法权力的机构,因为议会不是政府的橡皮图章。
伯考此举的理由也很充分:梅政府向议会提交表决的脱欧协议草案已经被英国议会两次以差额巨大的绝对多数票否决。
所以伯考声明,政府的第三份提案必须“完全不同”,而不能仅仅是重新措辞。
兴废由人事
英国议会议长伯考被指试图阻止脱欧,但他完全否认这一指责。
伯考此举实质上体现了在英国脱欧问题上意见分裂的英国议会各派对目前梅政府与欧盟达成的协议草案的不满。
BBC政治事务编辑劳拉·昆斯伯格(Laura Kuenssberg)表示,这是在英国脱欧进程的半道杀出了“程咬金”,让梅政府措手不及。
梅政府如何能绕过这一障碍尚不得而知。
一些议员认为,短期内英国脱欧似乎已经不可能,脱欧期限需要进一步延长。
虽然梅政府的脱欧大臣巴克莱说,政府仍可能最快下周提案希望议会讨论。但巴克莱同时也对BBC表示,政府正在认真考虑伯考的要求,在议会问题上要 “尊重裁判”, 遵守他的决定。
形势逼人急:梅首相本周四将前往布鲁塞尔出席早已安排好的欧盟峰会,与欧盟领导人讨论这个问题。眼看3月29日临近,英国脱欧下一步如何走,目前还不明朗。
Tuesday, March 19, 2019
Tuesday, March 12, 2019
中办印发通知:明确2019年为“基层减负年”
中央办公厅有关负责人11日介绍说,去年年底,习近平总书记在一份材料上作出重要批示,强调2019年要解决一些困扰基层的形式主义问题,切实为基层减负。《通知》明确提出将2019年作为“基层减负年”,充分体现了习近平总书记心系基层、关爱干部的深厚情怀,表明了党中央坚定不移全面从严治党、持之以恒狠抓作风建设的坚定决心,树立了为基层松绑减负、激励广大干部担当作为的实干导向。《通知》坚持严管和厚爱结合,对解决形式主义突出问题为基层减负作出进一步部署,有利于更好激励广大干部崇尚实干、担当作为,以优异成绩迎接新中国成立70周年。
《通知》围绕为基层减负,聚焦“四个着力”,从以党的政治建设为统领加强思想教育、整治文山会海、改变督查检查考核过多过频过度留痕现象、完善问责制度和激励关怀机制等方面,提出了务实管用的举措。
针对目前文山会海反弹回潮的问题,《通知》在这方面定了一些硬杠杠。一是层层大幅度精简文件和会议;二是明确中央印发的政策性文件原则上不超过10页,地方和部门也要按此从严掌握;三是提出地方各级、基层单位贯彻落实中央和上级文件,可结合实际制定务实管用的举措,除有明确规定外,不再制定贯彻落实意见和实施细则;四是强调少开会、开短会,开管用的会,对防止层层开会作出规定。
《通知》着力于解决督查检查考核过度留痕的问题,明确提出要强化结果导向,坚决纠正机械式做法。针对有的地方和部门搞“责任甩锅”,把问责作为推卸责任的“挡箭牌”,《通知》要求严格控制“一票否决”事项,不能动辄签“责任状”。《通知》还要求对涉及城市评选评比表彰的各类创建活动进行集中清理,优化改进各种督查检查考核和调研活动,不干扰基层正常工作。
此外,《通知》还对抓落实的工作机制作出安排,提出在党中央集中统一领导下,建立由中央办公厅牵头的专项工作机制。各地区党委办公厅要在党委领导下,负起协调推进落实责任。
问:《通知》着力于解决哪些困扰基层的形式主义突出问题?
答:许多干部群众反映,一些形式主义通过高调表态披上“政治正确”的外衣,口号喊得震天响、行动起来轻飘飘,表面上是在“两个维护”,实际上是伤害了“两个维护”。习近平总书记一针见血地指出,要针对表态多调门高、行动少落实差等突出问题,拿出过硬措施,扎扎实实地改。同时,空耗精力的会多文多、名目繁杂的督查检查考核多、流于表面的痕迹管理多,而且层层加码,让基层不堪重负。还要看到,有的干部不担当不作为,这有理想信念的问题、能力本领的问题,客观上也与一些地方和部门追责问责不够精准、泛化简单化有关系,导致一些干部怕问责、怕诬告,而不想干事。很多基层干部说,对形式主义问题,既深恶痛绝、又深陷其中,现在到了必须打一场力戒形式主义攻坚战的时候了!《通知》围绕为基层减负,聚焦“四个着力”,从以党的政治建设为统领加强思想教育、整治文山会海、改变督查检查考核过多过频过度留痕现象、完善问责制度和激励关怀机制等方面,提出了一些务实管用的举措。
问:《通知》在整治文山会海方面提出了哪些硬要求?
答:开会、发文是我们党作决策、抓落实的重要方法,但是目前文山会海反弹回潮的问题比较突出,《通知》在这方面定了一些硬杠杠。一是层层大幅度精简文件和会议。明确发给县级以下的文件、召开的会议减少30%-50%。首先从中央层面做起,省市两级都要大幅度精简。二是明确中央印发的政策性文件原则上不超过10页,地方和部门也要按此从严掌握。作出量化规定,目的是倒逼改进文风、提高文件质量。三是提出地方各级、基层单位贯彻落实中央和上级文件,可结合实际制定务实管用的举措,除有明确规定外,不再制定贯彻落实意见和实施细则。这一规定,是为了解决照抄照搬上级文件、层层发文的问题。四是强调少开会、开短会,开管用的会,对防止层层开会作出规定。针对一些地方和部门传达学习上级精神照本宣科、泛泛表态、刻意搞传达不过夜这些问题,提出了“三个不搞”的禁止性要求。
《通知》围绕为基层减负,聚焦“四个着力”,从以党的政治建设为统领加强思想教育、整治文山会海、改变督查检查考核过多过频过度留痕现象、完善问责制度和激励关怀机制等方面,提出了务实管用的举措。
针对目前文山会海反弹回潮的问题,《通知》在这方面定了一些硬杠杠。一是层层大幅度精简文件和会议;二是明确中央印发的政策性文件原则上不超过10页,地方和部门也要按此从严掌握;三是提出地方各级、基层单位贯彻落实中央和上级文件,可结合实际制定务实管用的举措,除有明确规定外,不再制定贯彻落实意见和实施细则;四是强调少开会、开短会,开管用的会,对防止层层开会作出规定。
《通知》着力于解决督查检查考核过度留痕的问题,明确提出要强化结果导向,坚决纠正机械式做法。针对有的地方和部门搞“责任甩锅”,把问责作为推卸责任的“挡箭牌”,《通知》要求严格控制“一票否决”事项,不能动辄签“责任状”。《通知》还要求对涉及城市评选评比表彰的各类创建活动进行集中清理,优化改进各种督查检查考核和调研活动,不干扰基层正常工作。
此外,《通知》还对抓落实的工作机制作出安排,提出在党中央集中统一领导下,建立由中央办公厅牵头的专项工作机制。各地区党委办公厅要在党委领导下,负起协调推进落实责任。
问:《通知》着力于解决哪些困扰基层的形式主义突出问题?
答:许多干部群众反映,一些形式主义通过高调表态披上“政治正确”的外衣,口号喊得震天响、行动起来轻飘飘,表面上是在“两个维护”,实际上是伤害了“两个维护”。习近平总书记一针见血地指出,要针对表态多调门高、行动少落实差等突出问题,拿出过硬措施,扎扎实实地改。同时,空耗精力的会多文多、名目繁杂的督查检查考核多、流于表面的痕迹管理多,而且层层加码,让基层不堪重负。还要看到,有的干部不担当不作为,这有理想信念的问题、能力本领的问题,客观上也与一些地方和部门追责问责不够精准、泛化简单化有关系,导致一些干部怕问责、怕诬告,而不想干事。很多基层干部说,对形式主义问题,既深恶痛绝、又深陷其中,现在到了必须打一场力戒形式主义攻坚战的时候了!《通知》围绕为基层减负,聚焦“四个着力”,从以党的政治建设为统领加强思想教育、整治文山会海、改变督查检查考核过多过频过度留痕现象、完善问责制度和激励关怀机制等方面,提出了一些务实管用的举措。
问:《通知》在整治文山会海方面提出了哪些硬要求?
答:开会、发文是我们党作决策、抓落实的重要方法,但是目前文山会海反弹回潮的问题比较突出,《通知》在这方面定了一些硬杠杠。一是层层大幅度精简文件和会议。明确发给县级以下的文件、召开的会议减少30%-50%。首先从中央层面做起,省市两级都要大幅度精简。二是明确中央印发的政策性文件原则上不超过10页,地方和部门也要按此从严掌握。作出量化规定,目的是倒逼改进文风、提高文件质量。三是提出地方各级、基层单位贯彻落实中央和上级文件,可结合实际制定务实管用的举措,除有明确规定外,不再制定贯彻落实意见和实施细则。这一规定,是为了解决照抄照搬上级文件、层层发文的问题。四是强调少开会、开短会,开管用的会,对防止层层开会作出规定。针对一些地方和部门传达学习上级精神照本宣科、泛泛表态、刻意搞传达不过夜这些问题,提出了“三个不搞”的禁止性要求。
Wednesday, March 6, 2019
अयोध्या पर 3 बार हुईं मध्यस्थता की कोशिशें, लेकिन अलग है SC की पहल
अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों से कहा कि अगर संभव हो सके तो मामले को मध्यस्थता से ही सुलझाया जाए. मस्जिद पक्ष मध्यस्थता की बात मानने के लिए तैयार है, लेकिन हिंदू महासभा इस पर सहमत नहीं है. अयोध्या मामले में पहली बार मध्यस्थता की कोशिश नहीं है. इससे पहले तीन बार ऐसी कोशिशों हो चुकी हैं, लेकिन विवाद किसी नतीजे के मुकाम तक नहीं पहुंच सकी. हालांकि पहली बार है जब कोर्ट की निगरानी में मध्यस्थता की पहल की जाएगी.
राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की गुंजाइश अब भी दिख रही है. यही वजह है कि अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने करीब डेढ़ घंटे की सुनवाई करने के बाद बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये सिर्फ जमीन का मसला नहीं है, बल्कि भावनाओं से जुड़ा हुआ मामला है. ऐसे में इस मामले को दोनों पक्ष मध्यस्थता के जरिए मामले को सुलझाएं. हालांकि कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत इस मामले में दोनों पक्षकार सुलझाएं.
मध्यस्थता के पक्ष में मुस्लिम पक्षकार
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा कि हम अयोध्या जमीन विवाद और इसके प्रभाव को गंभीरता से समझते हैं और जल्दी फैसला सुनाना चाहते हैं. अगर पार्टियां मध्यस्थों का नाम सुझाना चाहती हैं तो दे सकती हैं. हालांकि हिंदू महासभा मध्यस्थता के खिलाफ है. जबकि निर्मोही अखाड़ा और मुस्लिम पक्ष मध्यस्थता के लिए राजी है. मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ही तय करे कि बातचीत कैसे हो? सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षकारों से मध्यस्थता के लिए आज शाम पांच बजे तक ही नाम देने को कहा है.
वीपी सिंह के दौर में मध्यस्थता की पहली कोशिश
दिलचस्प बात ये है कि अयोध्या मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की इससे पहले कई कोशिशें हो चुकी हैं. पहली कोशिश 90 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह के समय में हुई, हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षकारों से बातचीत के सिलसिले भी शुरू हो गए. विवाद हल होता नजर आ रहा था और समझौते का ऑर्डिनेंस भी लाया जा रहा था. लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि वीपी सिंह सरकार को अयोध्या विवाद को सुलझाने वाले ऑर्डिनेंस को वापस लेना पड़ा.
चंद्रशेखर और नरसिम्हा राव के दौर में समझौते की हो चुकी पहल
वीपी सिंह के अयोध्या विवाद के समाधान की दूसरी पहल तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दौर में शुरू हुई और ये समाधान के करीब थी. लेकिन दुर्भाग्य था कि उनकी सरकार चली गई. उसके बाद नरसिम्हा राव की सरकार ने प्रयास किया, लेकिन फिर भी अंतिम हल तक नहीं पहुंचा जा सका. इसके बाद सरकार के स्तर पर दोबारा समझौते के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ.
अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में कांची पीठ के शंकराचार्य के जरिए भी अयोध्या विवाद सुलझाने की कोशिश की थी. तब दोनों पक्षों से मिलकर जयेंद्र सरस्वती ने भी भरोसा दिलाया था, मसले का हल महीने भर में निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा तब भी कुछ नहीं हुआ.
हालांकि, व्यक्तिगत स्तर भी अयोध्या मामले की कई बार समझौते की पहल की जा चुकी हैं. आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर ने पिछले दिनों हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षकारों से मिलकर मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन नाकामयाब रहे हैं. ऐसे में अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के निगरानी में होने वाले मध्यस्थता किस नतीजे पर पहुंचती है.
राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की गुंजाइश अब भी दिख रही है. यही वजह है कि अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने करीब डेढ़ घंटे की सुनवाई करने के बाद बड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ये सिर्फ जमीन का मसला नहीं है, बल्कि भावनाओं से जुड़ा हुआ मामला है. ऐसे में इस मामले को दोनों पक्ष मध्यस्थता के जरिए मामले को सुलझाएं. हालांकि कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत इस मामले में दोनों पक्षकार सुलझाएं.
मध्यस्थता के पक्ष में मुस्लिम पक्षकार
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा कि हम अयोध्या जमीन विवाद और इसके प्रभाव को गंभीरता से समझते हैं और जल्दी फैसला सुनाना चाहते हैं. अगर पार्टियां मध्यस्थों का नाम सुझाना चाहती हैं तो दे सकती हैं. हालांकि हिंदू महासभा मध्यस्थता के खिलाफ है. जबकि निर्मोही अखाड़ा और मुस्लिम पक्ष मध्यस्थता के लिए राजी है. मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ही तय करे कि बातचीत कैसे हो? सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षकारों से मध्यस्थता के लिए आज शाम पांच बजे तक ही नाम देने को कहा है.
वीपी सिंह के दौर में मध्यस्थता की पहली कोशिश
दिलचस्प बात ये है कि अयोध्या मामले को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की इससे पहले कई कोशिशें हो चुकी हैं. पहली कोशिश 90 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह के समय में हुई, हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षकारों से बातचीत के सिलसिले भी शुरू हो गए. विवाद हल होता नजर आ रहा था और समझौते का ऑर्डिनेंस भी लाया जा रहा था. लेकिन सियासत ने ऐसी करवट ली कि वीपी सिंह सरकार को अयोध्या विवाद को सुलझाने वाले ऑर्डिनेंस को वापस लेना पड़ा.
चंद्रशेखर और नरसिम्हा राव के दौर में समझौते की हो चुकी पहल
वीपी सिंह के अयोध्या विवाद के समाधान की दूसरी पहल तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के दौर में शुरू हुई और ये समाधान के करीब थी. लेकिन दुर्भाग्य था कि उनकी सरकार चली गई. उसके बाद नरसिम्हा राव की सरकार ने प्रयास किया, लेकिन फिर भी अंतिम हल तक नहीं पहुंचा जा सका. इसके बाद सरकार के स्तर पर दोबारा समझौते के लिए कोई प्रयास नहीं हुआ.
अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में कांची पीठ के शंकराचार्य के जरिए भी अयोध्या विवाद सुलझाने की कोशिश की थी. तब दोनों पक्षों से मिलकर जयेंद्र सरस्वती ने भी भरोसा दिलाया था, मसले का हल महीने भर में निकाल लिया जाएगा, लेकिन ऐसा तब भी कुछ नहीं हुआ.
हालांकि, व्यक्तिगत स्तर भी अयोध्या मामले की कई बार समझौते की पहल की जा चुकी हैं. आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर ने पिछले दिनों हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षकारों से मिलकर मध्यस्थता की कोशिश की, लेकिन नाकामयाब रहे हैं. ऐसे में अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के निगरानी में होने वाले मध्यस्थता किस नतीजे पर पहुंचती है.
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